Tuesday, August 18, 2009

जीव कालचक्र

-ओम राघव
प्रथम बीज अंकुरित हो एक नया चक्कर चलता है,
किसलय पुष्प बन वांड्गमय सुरभित बनता है
प्रसूत फूल या फल से, वह चक्कर चलता है,
कड़ी एक से दूजी, फिर तीसरी जा बनता है।
सिलसिला नहीं खत्म होता कई जन्म तक जाकर
कटते नहीं बंधन, षट रोग से प्रीत लगाकर
ग्रंथि च्कर में पड़ा होता ग्यान नहीं है,
मन माया से निकले, यह आसान नहीं है।
मत अनेक ग्रंथ वैदिक, पंथ भी समझाते हैं
भवसागर हो पार, युक्ति सभी बतलाते हैं।
कहें संत का वरद्हस्त, कल्याण जीव का होता
ग्यान हुआ तो धाम का मिलना सरल है होता।
शृंखला जीवन पर्यंत प्राण के साथ अभिन्न रहेगी
बदले नाम और रूप, निशेष न भिन्न रहेगी।
गर दें छोड़ नाम और रूप, इति इंद्र जाल होता है,
दिखे भिन्नता जब तक, नाम-रूप ही दिखता है।
कहें गर ये फंद आकर अब नहीं कटता है,
चौरासी का चक्कर, भुगतना फिर पड़ता है।
आप्त पुरुषों ने ग्रंथों का सार यही निकाला है,
भव सागर से तरे स्वयं, औरों को तारा है।
युगों-युगों तक जीव, काया रूपी वस्त्र बदलता,
जब तक नहीं वह अपनी मंजिल को पाता।
समझो शुद्ध स्वरूप, आत्म तत्व का ग्यान हो गया,
मिली अमरता, पार जीवन का उद्धार हो गया।
(11 मार्च 02)

3 comments:

  1. shashvat saty ko sundar aur vicharneey dhang se is kavita me aapne prastut kiya hai....

    bahut sundar kalyaanprad rachna hetu aabhar.

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  3. aapke shabd our bhaaw bahut hi yatharth ke karib le jata hai ...........khubsoorat rachna

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