Tuesday, May 4, 2010

रसानुभूति

ओम राघव
शरीर मन स्वस्थ बनें जिम्मेदारी स्वयं की अन्य की होती नहीं,
स्मरण शक्ति तीव्र जिनकी, प्रशंसा विभूतियां उन्हें ही हस्तगत होतीं,
पाप कर्म स्वयं के प्रकट होते दंड के रूप में स्वचालित यंत्र की तरह
राग और द्वेष से बच सकें, पाप के प्रेरक दंड का भागी करें।
क्रोधी स्वभाव का परिणाम विवेक धैर्य स्वास्थ्य भी नष्ट होता,
धैर्य न विवेक से ढंग के और सुखदायी परिणाम बनता।
विशुद्ध करे प्रणी मात्र को सत्य में करे दीक्षित
सिद्धांत विशाल बने वही बन जाता धर्म मानव
शक्ति नियम में होती नियम अनुशासन बनाता,
ज्ञान की लालसा स्वयं में ही आनन्द है,
मिले आत्मिक रसानुभूति से
उससे बड़ा न कोई और आनन्द भौतिक जगत में।
(०९-०५-१०)

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