Sunday, November 15, 2009

आम आदमी

ओम राघव
प्रकाश के पीछे अंधकार का ज्वर,
कर्म के लिए प्रतिरोध का स्वर
लौट आती आवाज टकराकर
दूर कहीं क्षितिज से।
होने या न होने का प्रश्न, प्रतिरोध बनता,
हो सादगी से सोंदर्यबोध, दूर होता,
वैचारिक दृष्टि में भिन्नता ही दीख पड़ती।
स्नेह मिलन कैसे, लोभ संवरण व्यवधान बनता।
संसार से मोह, लालच जीवन और जीने का लालच
मौत का भय, अंधकार आवरण बनता।
उत्सुक निगाह, करुण कहां किस के लिए?
कृत्रिम रोग में हम रंग गए हैं,
सादगी के सौंदर्य का बोध कैसे
और ऊंचा उठने का, ऊपर आकाश में उड़ने का।
आनन्द न देने देखता, आनन्द सादगी का।
उठते तभी प्रतिरोध के स्वर।
विचार भिन्नता, द्वंद्व युद्ध ही पैदा करे,
युद्ध वाहक न बनते शांति निर्माण के
मानव हितेषी नहीं होती युद्ध की विभीषिका?
आदर्श अनुशासित बने समाज की व्यवस्था
फिर रह जाती कोरी कल्पना
नैतिकता न्याय आर्थिक समानता
बनते अनैतिकता अन्याय असमानता मूलक
हो जाता युद्ध अनिवार्य वहां।
समझते न मूल्य जब नैतिक संवाद के
डरपोक बुजदिल बना मोह संसार से जीवन की लालसा में
नैतिकता समाज की तत्व ऐसे
प्रज्वल्लित करते प्रतिरोध का स्वर ही
समाज, राज बिगड़ता पीठ ठोकी जाती
अव्यवस्था भ्रष्टाचार निदान कैसे हो उनका
आदर्शहीनता अनुशासनहीनता को ही
जब प्रगतिशील उसे मानते
सीधा सरल आदमी आशा करे
आदर्श व्यवस्था की
पर होती कहां सुलभ आम आदमी को।
(२३-०९-०९)

1 comment: