Tuesday, November 8, 2011

समय

' सदा रहेगा - सच गुजरा हुआ कल,
कसक उठता है - याद करते आज भी
समय - स्थान - सब, सब लोग दूर कहाँ चले गये
वह वर्तमान - कल बन' अनजान बन गया .
छूटे सभी जहाँ-तहां - यहाँ रहे कुछ वहां गये
कई जाकर न लौटे कभी
यही सब नहीं हो रहा निरंतर
साड़ी सृष्टी में
कहाँ - कैसा ? प्रेम मिटता - द्वेष करता -
अभावों से घिरी नहीं है क्या - ये सारी दुनिया ?
उसमें ही रमता रहा - साडी जिन्दगी मन,
समय के फेर का ही नाम क्या दुनिया,
समझना कठिन - और कठिनतर होता गया
समय का भेद कब कैसे मिटे ?
समझना आगया --
छण का गुजरना - पहर दिन - वर्ष -
युग का समझना -
आसान हो जाये
इति ओम राघव

5 comments:

  1. सदा रहेगा - सच गुजरा हुआ कल,
    कसक उठता है - याद करते आज भी
    sach men........

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  2. समझना आगया --
    छण का गुजरना - पहर दिन - वर्ष -
    युग का समझना -
    आसान हो जाये
    ati sunder

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  3. वह वर्तमान-कल बन,अनजान बन गया....

    गहरे छेद गयी..

    पर सत्य तो यही है,कटु सत्य...

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  4. कल 08/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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