Thursday, April 15, 2010

महानता

ओम राघव

शरीर की न केवल महानता
कर्म के साथ ही जुड़ी है महानता
संत के ज्ञान की बनता कसोटी कर्म ही
प्रचार सच्चाई का सद्कर्म से होता
कथनी के साथ ज्ञान अगर जुड़ता नहीं
और ज्ञान के साथ कर्म भी जुड़ता नहीं
महानता लोक या परलोक में मिलती नहीं
समाज में रह स्वकर्म का पालन परहित में हो
जीवन की यात्रा करता सफल
जीव है सजीव तत्व परमात्मा की सृष्टि का
रचियिता नहीं सृष्टि का रचना में सहायक बनना
मानकर पूर्ण मन में न आ पायेगी सीखने की भावना
दलदल बन रहा संसार माया डुलाती पल-पल जिसे
सुख आत्मा की जागृत हो चेतना
साधना का लक्ष्य केवल चिन्तन और कर्त्तव्य से
प्रयोजन अभीष्ठ सिद्ध हो सके
अभीष्ठ सामर्थ्य साधन तो चाहिए
पूजा उपासना स्वध्याय मनन कालान्तर में
वट-वृक्ष बने छायादार शीतल छांव दे
वर्षों के श्रम से थके जीव को
ब्रह्म लोक या मोक्ष स्थान विशेष नहीं
परिष्कृत बने आस्थाएं, पशु प्रवृत्ति से
देव सम वृत्ति बने, स्वर्गवस्था वही
देव प्रवृत्ति ढालती मोक्ष में या नक्षत्र विलग से
नहीं लोक और परलोक में स्थित परिचायक वही महानता का।।
(२३-०३-१०)

Monday, April 12, 2010

जीवन

ओम राघव
पेट और प्रजनन तक सीमित जीवन
खीझ और कष्ट भरा भार ढोता जीवन
रोते जन्म लेता, रुलाते विदा होता जीवन

हाड़-मास, मल-मूत्र से भरी काया
अति कुरूप-कर्कशा और निष्ठुर भौतिकी
घिनौना-खिलौना मात्र मानव शरीर
यह दिखती सच्चाई, शरीर और जीवन की
समुद्ररूपी जीवन की गहराई में
उतरने वाले जीव के लिए पर नहीं ऐसा

पड़ी होती बहुमूल्य रत्न-राशि
समुद्र तल की गहराई में ही,
झाग-फैन, सीप-शंख और कूड़ा करकट
से ही ऊपरी सतह भरी होती
गहराई में जाने पर ही उपलब्ध ढेर रत्न-राशि होती
विकसित अग्नि-परीक्षा से सुपात्रता होती,
बनता तभी अमूल्य धरोहर-जीवन समाज के लिए

शरीर और मन का संयुक्त श्रम
कर्म को उत्पन्न करता, हर कड़ी का
समाधान विचार और क्रिया से मिलता
चैन और संतोष कर्म की गहनता से मिले
आस्थाएं सब जुड़ी होतीं साथ अंतरआत्मा के

फूट पड़ता प्रेरणा स्रोत जहां से,
असुन्दर-कर्कश दिखता जीवन
बदल जाता सुन्दरता-सुघड़ता में सदा के लिए
स्वयं और समाज दोनों के लिए।

(०३-०३-१०)

Saturday, April 10, 2010

व्यक्त-अव्यक्त

ओम राघव

अकर्त्ता जब कर्त्ता बने,
उसके अस्तित्व का प्रकटीकरण बनता
अकर्त्ता सुषुप्ति का ही पर्याय है
कर्त्ता बना-जग गया ब्रह्म का अभिप्राय है
जग जाती जगती उसके साथ ही
आभास तभी जीवन का होने लगे
अकर्त्ता बन मुर्दा हो गए हैं
फिर मर्दे का अस्तित्व कैसा?
व्यक्त-अव्यक्त का ही खेल है।
व्यक्त (प्रकृति) ठोस स्वतः गोचर,
हर वस्तु की समग्रता के साथ प्रगट
पर आधार उसका अव्यक्त ही है
संभव स्वरूप जितने अव्यक्त ही आधार उनका
कार्य में कारण उपस्थित
हर घटना के लइ आधारा होता
विशेष कार्य का होता आदिकारण विशिष्ठ
उससे ही उत्पन्न या दिखता रहा है
व्यक्त से जानना अव्यक्त को
ग्यान की प्रथम सीढ़ी रहा है

(१३-०३-१०)

Thursday, March 4, 2010

सत्यम-शिवम्-सुन्दरम

ओम राघव
अजर - अमर , परमात्मा - गुनातीत निर्गुण
शब्द - रूप प्रारूप निश्कल
अचिन्त्य ब्रह्म - अचिन्त्य -कार्य जगत भी !
एक बूँद आत्मा - सागर रुपी ब्रह्म की
अन्नंत सामर्थ्य निराकार परमात्मा की !
मूर्ती- देवालय - दीवार नहीं पर व्याप्त उनमे परमात्मा ,
संत मत - ज्ञान मत का सार ही गूढ़ उपासना
सामान्य - मस्तिष्क - गूढ़ता में खोता नहीं
जीव प्रकर्ति , ब्रहम भिन्न - सत्ताएं भाष्टि!
भिन्नता समझ देख - ध्यान ठहर पाता नहीं
बनता इष्ट - स्थूल रूप ही - उसके लिए ,
योग, उपवास - समाधि - कठोर यातनाये ---
शरीर को दें किस लिए ;
प्रेम ही है भक्ति - दिव्यता - साकार ब्रहम की
करो प्रेम सबसे - प्रतिदान में मिलेगा प्रेम ही
लोक - परलोक का आनंद सब कुछ ,
साकार ब्रहम से मिलेगा
जीवन में - पाया - सभी कुछ - हो समर्पित उसी को -
सामान्य -मन - मस्तिष्क न स्वीकार करता निराकार को
साकार ही है - सत्यम-शिवम्- सुन्दरम , उसके लिए
२१/२/१०

Friday, February 19, 2010

२२ वीं सदी सपने के आइने में (वास्तव में देखा)

ओम राघव
२०वीं सदी की अपनी कुटिया छोड़,
चला गया अपनी निकट की रिस्तेदारी में
फासला दो दहाई मील का
गांव का नक्शा पहले जैसा न था।
थोड़ी सी पहचान ही बची थी
जाना जिससे रिस्तेदार के आवास का पता
निकट से देखा, लोग अजनबी से दिख रहे
मैं भी बना था अजीब जिनके लिए
द्वार से पहले निकट के मामा जी दिखे
पहंचाना गले लग फूट-फूट कर रोने लगे
बोले-लाला, भाई भावज, घर वाले
सब मेरे दुश्मन हो गए, सभी ने नाता कब का तोड़ दिया
श्राद्ध-संस्कार तक न मेरा किया
मैं चौंका यह तो मामाजी की मृत रूह है
लिपट कर जार-जार रो रही थी
कठिनाई से छोड़ उनको बढ़ चला द्वार की ओर
मिल दिल को तसल्ली दे सकूं
बाहर ही गैस का चूल्हा जल रहा था, आगे आंगन में भी वही दृश्य था
और आगे तीसरा चूल्हा जल रहा था
सभी अपने-अपने परिवार के साथ बैठकर वार्तालाप कर रहे थे
दुनिया की खुशहाली अपनी बता खुश हो रहे थे
मुझे पहचानना तो दूर सभी घूरते थे
अनजान की स्पष्ट झलक थी सबके चेहरे पर
लगता था कोई भूत उनके घर पर आ गया है
पहन कर वस्त्र पुराने सौ साल के
चाय-पानी खाना तो दूर पहचान से कर रहे थे इनकार
नाम बुजुर्गों का लिया, जिन्हे मैं जानता था
ढेर स्नेह जीवन में मिला था
बोले-यह नाम हमारे पड़दादा जी का था
भाषा समझ से तुम्हारी परे
अवश्य ही कोई ठग या बहरूपिया हो
न आपको देखा और नाम भी न सुना
अब रुकना संभव न था
आगे चल गांव पर एक नजर डाल लूं
शायद कोई निशानी बची हो
जिनकी यादें अभी शेष हैं
बिजली-डिश टेलिफोन आदि के तार न थे
सड़कें लापता थीं
कंप्यूटर भी गायब हो चले थे
मात्र उनका जिक्र लोग कर रहे थे
अन्य देशों के समाचार नेता अभिनेताओं
से अलबत्ता बातें कर रहे थे
आधुनिक माने जाने वाले यंत्र के बिना
सब कुछ अजब-गजब था।।
साहस कर एक आदमी से बात की
बोला-हां इस नाम के आदमी इस गांव में थे
पर वह कबके परलोक सिधार गए
सुना था बड़े मिलनसार थे
रिस्तेदार तो रिस्तेदार होता ही है
अजनबी की भी दूध-घी से खातिरदारी करते थे
पर वह तो चौथी पीढ़ी के इनसान थे
तुम बात कब की कर रहे हो
आप उनके निकट की पीढ़ी के रिस्तेदार हो
इतने साल बाद अपनी ननिहार आये हो
आपकी खातिरदारी मैं करूंगा
और गांव को बदनामी से बचाऊंगा
ये तो इंटरनैट, रोबोट, सुपर कंप्यूटर के जमाने के युवा हैं
न जरूरत पुस्तकों की, न कभी हाथ से काम किया
जब स्वार्थ था कुछ पाने का
वह कब का खो गया है
भविष्य ही केवल बचा है
अपना-पराया न शेष है
यह २२वीं सदी है।
(०९-०२-१०)

Tuesday, February 16, 2010

श्रेष्ठ सत्ता

ओम राघव
श्रेष्ठ को समादर चाहिए
मन, वचन, कर्म की शुद्धि
उत्पन्न वासनाओं से मुक्त इंद्रिया बनें
अंतर्मन में बिठाने से पूर्व
श्रेष्ठ सत्ता को उपयुक्त स्वच्छता चाहिए
शांत शीतल सात्विकता का
बाहर भीतर चहुं ओर समावेश चाहिए
तब होगी प्रतिष्ठित और प्रकाशित आत्मा
हर साधन की बने सफलता,
मानसिक पवित्रता
सामन्य मनो भूमि के लिए
भ्रांतिया अवांछनीयताएं दूर हों
श्रेष्ट सत्ता की ओर उन्मुख हो सकें
विद्यमान है उसकी सत्ता
जब जड़ चेतन सभी में
सोच ऐसी भी फिर क्यों बने
उपस्थित नहीं देवालय गिरजाघर प्रतिमा में
सामान्य मन मस्तिष्क ध्यान न कर सकें
उपयुक्त स्वच्छता मन वचन क्रम से
श्रेष्ठ सत्ता को आसीन करने के लिए
बने श्रेष्ठतर मनोभूमि समर्थ फिर
स्थापित करने में श्रेष्ठतर सत्ता को
अपने अंतर में।।
(०५-०२-१०)

Saturday, February 13, 2010

व्यवधान

ओम राघव
व्यक्ति विशेष की परख करते हम
अपने आदर्शों के अनुरूप
दूसरे द्वारा माने जाने वाले देवता को
देखते परखते या माप करते
अपनी धारणा से तय देवता से
दूसरे के माने जाने वाले आदर्श से
करते परख अपने द्वारा धारण आदर्श से
बनता जो अनबन का व्यवधान आपसी सामन्जस्य का
प्रवृति और निवृत्ति कर्म का मूल और
धर्म का प्रारम्भ मानते हैं
शुद्ध अजर अपरिणामी परमात्मा कहां कैसे?
पर भेद हमने गढ़ लिया है।
मात्र अपना ही दृष्टिकोण थोप कर
शरीर यह कन्या समान हमको मिला
पालन-पोषण करना जिसका बखूबी
पर नहीं कभी अपना मानना
निश्चिंत अगर होना चाहते
शरण भगवान की उसको सोंपना
ध्यान विदाई का रहे सदा शरीर अपना नहीं
व्यवधान फिर कैसे रहेगा?
(०३-०२-१०१०)