-ओम राघव
सुन पोते का फोन, मन दादी का भर गया
घर के सारे लोगों में अनन्द कर गया।
वाणी तोतली दादी में नवप्राण भर गई
माहोल सारे घर का शीतल यान कर गई।
याद पोते की दादी को खूब सताती है,
जब आता नहीं फोन, तब उसे रुलाती है।
मां-बेटे करना फोन, दादी रोज बताती है
गर सुन ना पाये फोन, दादी की फटती छाती है।
रहता पोता दूर, वह पास न आता है,
कहता-लो मैं आ गया, फोन से उसे बताता है।
दादी का पूछे हाल, अपना हाल बताता है
छोटी अपनी बहना का भी राग सुनाता है।
दादी तरस रही है, पोता जल्दी आएगा
सुन्दर चांद सा मुखड़ा आकर उसे दिखाएगा।
रूठेंगा, झगड़ेगा, मां को गलत बताएगा
सौ-सौ हैं पापा की गलती, उसे सुनाएगा।
दादी डॉंटेंगी उनको, पोते को लाड़ लाड़ाएंगी,
दादी की ये प्रीत लाल को खुश कर जाएगी।
(17 सितंबर 2004)
Sunday, July 26, 2009
Saturday, July 25, 2009
सद्कर्म
-ओम राघव
क्या स्मृति बिगत की कुछ रहती नहीं
फिर कल्पना से मान लें
मिला है शरीर बुद्धि मन स्थान और आत्मा को जान लें-
प्रारब्ध नियति पूर्वकर्म कुछ भी कहो
बिना सोचे क्या जिन्दगी नहीं उम्र भर चलती रही?
और पुण्य व पाप के घट भरती रही -
कब क्यों इच्छित अनिच्छित भोग-भोगे?
दिल-दिमागी चित्र खींचा एक ने
समझने में बड़ा प्यारा लगा
पर व्यवहार में कुछ और देखा
पर दूसरा इन्सान जिसका चरित्र और व्यवहार
आदर्श अनुकरणीय देखा
क्या सोचना?
यह होगा न वह होगा
न सोचा कभी- होता रहा वैसे अधिक
कर्म तो होते रहेंगे दृष्टिकोण अपना या गैर का
गेऱना समझना फेर किसका
समझना क्या आसान?
दोष कहां-फिर और किसका?
अतःएव-
विगत में क्या किया?
मात्र सदकर्म करने में ही ध्यान हो
परिणाम-इदम शरीर स्थान मन बुद्धि कर्म सुख
जो पाया वर्तमान में
वर्तमान आधारशिला भविष्य की
सदकर्म से सदमार्ग
शांतिमिले जीव का निश्चय ही कल्याण हो।
सदकर्म की हो सोच और कर्म कर।
(13 सितंबर 2004)
क्या स्मृति बिगत की कुछ रहती नहीं
फिर कल्पना से मान लें
मिला है शरीर बुद्धि मन स्थान और आत्मा को जान लें-
प्रारब्ध नियति पूर्वकर्म कुछ भी कहो
बिना सोचे क्या जिन्दगी नहीं उम्र भर चलती रही?
और पुण्य व पाप के घट भरती रही -
कब क्यों इच्छित अनिच्छित भोग-भोगे?
दिल-दिमागी चित्र खींचा एक ने
समझने में बड़ा प्यारा लगा
पर व्यवहार में कुछ और देखा
पर दूसरा इन्सान जिसका चरित्र और व्यवहार
आदर्श अनुकरणीय देखा
क्या सोचना?
यह होगा न वह होगा
न सोचा कभी- होता रहा वैसे अधिक
कर्म तो होते रहेंगे दृष्टिकोण अपना या गैर का
गेऱना समझना फेर किसका
समझना क्या आसान?
दोष कहां-फिर और किसका?
अतःएव-
विगत में क्या किया?
मात्र सदकर्म करने में ही ध्यान हो
परिणाम-इदम शरीर स्थान मन बुद्धि कर्म सुख
जो पाया वर्तमान में
वर्तमान आधारशिला भविष्य की
सदकर्म से सदमार्ग
शांतिमिले जीव का निश्चय ही कल्याण हो।
सदकर्म की हो सोच और कर्म कर।
(13 सितंबर 2004)
Friday, July 24, 2009
मृत्यु है आनंददायक
-ओम राघव
रहें तन से मन से स्वस्थ्य
वही जीना सुंदर है
रहें रोगी तन से मन से
वह जीना ही असुंदर है
स्वस्थ रहें जब तक दुनिया में
जीने का वास्तविक अर्थ है
थकें हाथ-पैर उंगलियां शरीर की
औरों के सहारे का जीवन ही व्यर्थ है।
जिएं जितने वर्ष दुनिया में
उसका क्या मूल्य है
समाज हित किए कर्म जिसने
वही जीवन अमूल है
रोगी तन-मन कर्ज समाज का
बनी केवल भार इस भूमि का
विश्व में पल रहे अनेक जीव
जीना उसका भी यथा एक कृमि का
गर मौत आ गई शोक-मलाल कैसा?
न कभी जीव और न मन मरे
मरण केवल मानव शरीर का
छोड़ना जब कभी यह तन पड़े
मृत्यु है आनंददायक
डूब आकंठ जीव स्नान करे जिसमें
जीवन के श्रम की होती थकान दूर
नए वस्त्र जीव पहन नव-द्वार चल पड़े
स्वागत है आए मौत उसका,
चल पड़ मेहमान की तर्ज पर
आया जो रहता कुछ देर-दिन
चला जाता लौट निज द्वार जिस तरह।।
(11 सितंबर 2004)
रहें तन से मन से स्वस्थ्य
वही जीना सुंदर है
रहें रोगी तन से मन से
वह जीना ही असुंदर है
स्वस्थ रहें जब तक दुनिया में
जीने का वास्तविक अर्थ है
थकें हाथ-पैर उंगलियां शरीर की
औरों के सहारे का जीवन ही व्यर्थ है।
जिएं जितने वर्ष दुनिया में
उसका क्या मूल्य है
समाज हित किए कर्म जिसने
वही जीवन अमूल है
रोगी तन-मन कर्ज समाज का
बनी केवल भार इस भूमि का
विश्व में पल रहे अनेक जीव
जीना उसका भी यथा एक कृमि का
गर मौत आ गई शोक-मलाल कैसा?
न कभी जीव और न मन मरे
मरण केवल मानव शरीर का
छोड़ना जब कभी यह तन पड़े
मृत्यु है आनंददायक
डूब आकंठ जीव स्नान करे जिसमें
जीवन के श्रम की होती थकान दूर
नए वस्त्र जीव पहन नव-द्वार चल पड़े
स्वागत है आए मौत उसका,
चल पड़ मेहमान की तर्ज पर
आया जो रहता कुछ देर-दिन
चला जाता लौट निज द्वार जिस तरह।।
(11 सितंबर 2004)
मौन या संवाद से
-ओम राघव
कैसे-किसको पुकारें?
कब-कहां संसार में रह कर
और कैसे संवारें?
मौन से या संवाद से
व्यवधान लगते संवाद से प्रसूत तर्क
मन-इंद्रियों की शक्ति अपनी-मौन ज्यादा
संवाद से संतुष्ट, कुछ असंतुष्ट होते
कैसे हो सके संवाद?
सर्वमान्य फिर
बिना संवाद शून्य है समाज
है तथ्य यह भी नहीं क्या?
साथ मन के संवाद-बने मौन
इन्द्रिय गोचर नहीं, पर वह भी तो संवाद है
यह संसार कल्पित, संवाद से ही होता प्रकट
सुख-दुख-हर्ष-अमर्ष लेकर
मानो वास्तविक लगता और गहरा संसार फिर
आज है भविष्य में ऐसे ही रहेगा?
मन से मौन-संवाद आत्मा से हो
जीव लाखों वर्ष से कर रहा है खोज जिसकी
क्या संभव है सार्थक पुकार?
फिर सोच कैसी?
सोचना ही व्यर्थ जैसे
समझना अनिष्ट या कष्ट का कारक दूसरा (संवाद)
सुख-हर्ष अपना साख दे निज अहंकार को
है जो कल्पित निरा
निज सोच का भाव उसके अनुरूप ही संवाद है?
अंदर से मिले शक्ति मौन से
बाह्य विचारों की बने शून्यता
तब ही लक्ष्य होगा सामने
ये दृश्य संसार कुछ और ही दृश्यमान होगा
पुकार-सत्य का कहना कठिन, सुनना कठिन
न शरीर अपना, न मन अपना, बने सहज स्थिति
आनंदानभूति प्रकट सबकुछ स्वयं हो
आना सफल जीना सफल समाज का
और सफल अंतिम सफर
संवाद से संसार है-समाज है
पर आत्मा की तो मौन ही आवाज है
संवाद करना ही पड़ेगा-दीखते संसार में
मौन होना ही पड़ेगा, सत्य को अगर खोजना है
मौन ही है अंतिम पड़ाव जीव का।
(९ नवंबर २००४)
कैसे-किसको पुकारें?
कब-कहां संसार में रह कर
और कैसे संवारें?
मौन से या संवाद से
व्यवधान लगते संवाद से प्रसूत तर्क
मन-इंद्रियों की शक्ति अपनी-मौन ज्यादा
संवाद से संतुष्ट, कुछ असंतुष्ट होते
कैसे हो सके संवाद?
सर्वमान्य फिर
बिना संवाद शून्य है समाज
है तथ्य यह भी नहीं क्या?
साथ मन के संवाद-बने मौन
इन्द्रिय गोचर नहीं, पर वह भी तो संवाद है
यह संसार कल्पित, संवाद से ही होता प्रकट
सुख-दुख-हर्ष-अमर्ष लेकर
मानो वास्तविक लगता और गहरा संसार फिर
आज है भविष्य में ऐसे ही रहेगा?
मन से मौन-संवाद आत्मा से हो
जीव लाखों वर्ष से कर रहा है खोज जिसकी
क्या संभव है सार्थक पुकार?
फिर सोच कैसी?
सोचना ही व्यर्थ जैसे
समझना अनिष्ट या कष्ट का कारक दूसरा (संवाद)
सुख-हर्ष अपना साख दे निज अहंकार को
है जो कल्पित निरा
निज सोच का भाव उसके अनुरूप ही संवाद है?
अंदर से मिले शक्ति मौन से
बाह्य विचारों की बने शून्यता
तब ही लक्ष्य होगा सामने
ये दृश्य संसार कुछ और ही दृश्यमान होगा
पुकार-सत्य का कहना कठिन, सुनना कठिन
न शरीर अपना, न मन अपना, बने सहज स्थिति
आनंदानभूति प्रकट सबकुछ स्वयं हो
आना सफल जीना सफल समाज का
और सफल अंतिम सफर
संवाद से संसार है-समाज है
पर आत्मा की तो मौन ही आवाज है
संवाद करना ही पड़ेगा-दीखते संसार में
मौन होना ही पड़ेगा, सत्य को अगर खोजना है
मौन ही है अंतिम पड़ाव जीव का।
(९ नवंबर २००४)
Wednesday, July 22, 2009
अभिन्नता
-ओम राघव
अभिन्न से भिन्न होते ही
समय ने करवट बदली
बदला काल, शीतल लालिमा
चकाचौंध बन पूर्व दिशा बदले यथा
भाष्कर की लालिमा क्षितिज को छोड़कर जाने लगी
मिलन से पूर्व की प्रार्थना
प्रार्थना का सफर
सहचर्य में नहीं पड़ा खलल
मांगा न कुछ- हो प्रसूत अविश्वास जिससे
न लेना भला और न देना भला
मन का देवता, न कुछ चाहिए
जहां सब कुछ सामान्य है
विश्वास खोकर अविश्वास मिलता
शांति की भेंट कोलाहल पर चढ़ गई
सुनामी लहर जैसी आगे बढ़ गई
तीव्र वेग-रोक पाये कौन उसको
अविश्वास का प्रतिकार
प्रारब्ध प्रसूत संस्कार
क्षमता घटना बदले अघटना में
गीता के ब्रह्म वाक्य सा
न करेगा-युद्ध अर्जुन-कौरव सेना बच सकेगी
शरीर नश्वर नष्ट होंगे
संस्कार वस , स्वभाव बरबस लगा दे कार्य पर
जिसक न तू करना चाहता
अभिन्नता का ग्यान हो
फिर भिन्नता कैसी?
जन्म कैसा? मृत्यु कैसी?
क्लेश कैसा?
जब नहीं भिन्नता
ईर्ष्या अहंकार क्रोध कैसा?
और किस पर?
दीखता भिन्न वह स्वयं है।
अभिन्नता ही ग्यान, आनंद, मोक्ष है
समझभर की देर
नसमझभर का ही फेर है।।
(7 जनवरी 2004)
अभिन्न से भिन्न होते ही
समय ने करवट बदली
बदला काल, शीतल लालिमा
चकाचौंध बन पूर्व दिशा बदले यथा
भाष्कर की लालिमा क्षितिज को छोड़कर जाने लगी
मिलन से पूर्व की प्रार्थना
प्रार्थना का सफर
सहचर्य में नहीं पड़ा खलल
मांगा न कुछ- हो प्रसूत अविश्वास जिससे
न लेना भला और न देना भला
मन का देवता, न कुछ चाहिए
जहां सब कुछ सामान्य है
विश्वास खोकर अविश्वास मिलता
शांति की भेंट कोलाहल पर चढ़ गई
सुनामी लहर जैसी आगे बढ़ गई
तीव्र वेग-रोक पाये कौन उसको
अविश्वास का प्रतिकार
प्रारब्ध प्रसूत संस्कार
क्षमता घटना बदले अघटना में
गीता के ब्रह्म वाक्य सा
न करेगा-युद्ध अर्जुन-कौरव सेना बच सकेगी
शरीर नश्वर नष्ट होंगे
संस्कार वस , स्वभाव बरबस लगा दे कार्य पर
जिसक न तू करना चाहता
अभिन्नता का ग्यान हो
फिर भिन्नता कैसी?
जन्म कैसा? मृत्यु कैसी?
क्लेश कैसा?
जब नहीं भिन्नता
ईर्ष्या अहंकार क्रोध कैसा?
और किस पर?
दीखता भिन्न वह स्वयं है।
अभिन्नता ही ग्यान, आनंद, मोक्ष है
समझभर की देर
नसमझभर का ही फेर है।।
(7 जनवरी 2004)
कौन प्रथम
-ओम राघव
भाष्कर होगा उदय-अभी देर है
निकल पड़े घर से- चरवाहा मजदूर किसान
चाह पाले खेत करने काम करने
मिले जो भी काम-
घर पुताई या रंगाई, फसल की हो कटाई
कारखाने की सफाई
जो भी काम हो करेगा, दिन के अवसान तक
खेत जोते फसल बोई, कभी अधिक वर्षा
खरपतवार सूखा कभी टिड्डीदल ही खा गया
जमींदार बना पर मजदूर हो गया
न खाने का पूरा पड़ा, लगान देना रह गया
घर से निकला सदा, सूरज से बहुत पहले
नवजात शिशु अनजान-बाप के अस्तित्व से
जंगल की हो कटाई या कारखाने की सफाई
मालिक की रहे सलामत मुटाई
स्वयं लक्कड़ काट काठ बन गया
नहीं बनना चाहता अधिक धरती का बोझ
काम ही नियती बना उसकी
जीवन यापन की भरपाई हो सके
कार्य विनिमय से बस इतना चाहता
बच्चे पल सकें पढ़ सकें
उनके ब्याह चिंता से हो सके मुक्त
इसी को मान लेता परम मुक्ति
जीवन के पार मुक्ति का
उससे कोई सरोकार नहीं
अवसर ही नहीं उससे अधिक सोचने का
उसके निकलने के बाद
निकलता है दिन
कौन निकलता है प्रथम
पता अब चल गया है?
(5 नवंबर 2003)
भाष्कर होगा उदय-अभी देर है
निकल पड़े घर से- चरवाहा मजदूर किसान
चाह पाले खेत करने काम करने
मिले जो भी काम-
घर पुताई या रंगाई, फसल की हो कटाई
कारखाने की सफाई
जो भी काम हो करेगा, दिन के अवसान तक
खेत जोते फसल बोई, कभी अधिक वर्षा
खरपतवार सूखा कभी टिड्डीदल ही खा गया
जमींदार बना पर मजदूर हो गया
न खाने का पूरा पड़ा, लगान देना रह गया
घर से निकला सदा, सूरज से बहुत पहले
नवजात शिशु अनजान-बाप के अस्तित्व से
जंगल की हो कटाई या कारखाने की सफाई
मालिक की रहे सलामत मुटाई
स्वयं लक्कड़ काट काठ बन गया
नहीं बनना चाहता अधिक धरती का बोझ
काम ही नियती बना उसकी
जीवन यापन की भरपाई हो सके
कार्य विनिमय से बस इतना चाहता
बच्चे पल सकें पढ़ सकें
उनके ब्याह चिंता से हो सके मुक्त
इसी को मान लेता परम मुक्ति
जीवन के पार मुक्ति का
उससे कोई सरोकार नहीं
अवसर ही नहीं उससे अधिक सोचने का
उसके निकलने के बाद
निकलता है दिन
कौन निकलता है प्रथम
पता अब चल गया है?
(5 नवंबर 2003)
Tuesday, July 21, 2009
अराधना
-ओम राघव
छोड़ मोह-माया को जल्दी, लगजा प्रभु की याद में
रह जाए केवल पक्षतावा, इस जीवन के बाद में
नश्वर ये संसार, छोड़ कर जाना ही होगा
है कई जन्मों का भार, जिसे उठाना ही होगा
हीरे से अधिक कीमती, सांसें खो डालीं
साधन बना शरीर, शीघ्र ही हो जावे खाली
बचपन युवा बुढ़ापा, ऐसे ही खो डाला
दिन खेल-कूद आराम, रात गफलत में सो जाना
बचपन और जवानी खोई, कीमती सांसें भी खोईं
बने उम्र भर कितने रिश्ते, पर रहा नहीं कोई
साधन मिला शरीर, सार्थक है इसको करना
प्रभु की रहे निरंतर याद, रहे फिर कोई डर ना
जीवन यह संसार, स्वप्नवत इसे समझना
है जबतक अग्यान, तभी तक नाटक करना
क्षण-क्षण प्रभु की याद, मंजिल को लाएगी
काम-क्रोध मद-लोभ की भट्टी, नहीं जलाएगी
किसी शब्द से और मंत्र से, प्रभु की याद करो
मंजिल तक पहुंचाएगा, न संशयवाद करो
श्रवण-कीर्तन वंदन, प्रभु का सिमरन करना है
छोड़ सहारा जग का, आत्म समर्पण करना है
आ जाए जब ग्यान, फिर पर्दा नहीं रहे
होवे नाटक का अंत, पात्र का धंधा नहीं रहे
खुले न अंतरचक्षु, तभी तक माया की सूरत
होवे आत्मा का भान, न मन की रहे जरूरत
मन का सारा खेल, निरंतर तरसाता है
बिन प्रभु की याद, जीव का मन घबराता है
( 3 नवंबर 2003)
छोड़ मोह-माया को जल्दी, लगजा प्रभु की याद में
रह जाए केवल पक्षतावा, इस जीवन के बाद में
नश्वर ये संसार, छोड़ कर जाना ही होगा
है कई जन्मों का भार, जिसे उठाना ही होगा
हीरे से अधिक कीमती, सांसें खो डालीं
साधन बना शरीर, शीघ्र ही हो जावे खाली
बचपन युवा बुढ़ापा, ऐसे ही खो डाला
दिन खेल-कूद आराम, रात गफलत में सो जाना
बचपन और जवानी खोई, कीमती सांसें भी खोईं
बने उम्र भर कितने रिश्ते, पर रहा नहीं कोई
साधन मिला शरीर, सार्थक है इसको करना
प्रभु की रहे निरंतर याद, रहे फिर कोई डर ना
जीवन यह संसार, स्वप्नवत इसे समझना
है जबतक अग्यान, तभी तक नाटक करना
क्षण-क्षण प्रभु की याद, मंजिल को लाएगी
काम-क्रोध मद-लोभ की भट्टी, नहीं जलाएगी
किसी शब्द से और मंत्र से, प्रभु की याद करो
मंजिल तक पहुंचाएगा, न संशयवाद करो
श्रवण-कीर्तन वंदन, प्रभु का सिमरन करना है
छोड़ सहारा जग का, आत्म समर्पण करना है
आ जाए जब ग्यान, फिर पर्दा नहीं रहे
होवे नाटक का अंत, पात्र का धंधा नहीं रहे
खुले न अंतरचक्षु, तभी तक माया की सूरत
होवे आत्मा का भान, न मन की रहे जरूरत
मन का सारा खेल, निरंतर तरसाता है
बिन प्रभु की याद, जीव का मन घबराता है
( 3 नवंबर 2003)
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